Wednesday, August 28, 2013

कान्हा का मैनेजमेंट

जानिए श्रीकृष्ण के कुशल प्रबंधन को

नवसृजन और जनकल्याण के प्रणेता भगवान श्रीकृष्ण की अनेक छवियां भारतीय जनमानस से जुडी हुई हैं। श्रीकृष्ण में सबसे खास बात यह है कि उनका दर्शन व्यावहारिक था। यही वजह है कि वे दुनियां के पहले मैनेजमेंट गुरु भी कहलाते हैं। जीवन को यथार्थ में देखने की उनकी दृष्टि थी। वे परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेते थे। इस लिहाज से उनके प्रबंधन नीति आज भी प्रासंगिकता है। संक्रमण और तथाकथित सुशासन के इस दौर में आज जब पूरे विश्व में नीतियों का संकट है। एक बार फिर श्रीकृष्ण के प्रबंधन और दर्शन की जरूरत महसूस हो रही है।

आत्मनिरीक्षण करें-

गीता में श्रीकृष्ण मनुष्य को लगातार आत्मनिरीक्षण के लिए प्रेरित करते हैं। कई बार मनुष्य दूसरों के कहने पर उद्विग्न हो जाता है और कई बार अपने कटु वचनों से दूसरों को उद्विग्न कर देता है। प्रोफेशनल लाइफ में यह दोनों बातें करियर के लिए घातक होती हैं। कान्हा इनसे बचते हुए स्वधर्म का पालन करने की भी सलाह देते हैं।
सबको लेकर चले-

प्रबंधन में अक्सर ये चुनौती आती है,एक ही वक्त में कोई बहुत आगे निकल जाता है तो कोई थोड़ा पीछे छूट जाता है। ऐसे में बहुत सारे लोग अपनी-अपनी प्रतिष्ठा और अपने अहं को लेकर अ़ड जाते हैं तब समस्या जटिल हो जाती है। सभी की प्रतिष्ठा बनी रहे तथा समस्या का समाधान भी हो जाए,यह कुशल प्रबंधक का ही काम होता है। श्रीकृष्ण ने अपनी इस प्रतिभा का अनेक अवसरों पर परिचय दिया।

सर्वग्राही बनें-

किसी भी प्रबंधक के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने क्षेत्र के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों के विषय में जितनी अधिक जानकारी रखेगा,वह उतना ही सफल प्रबंधन तथा अपनी टीम का मार्गदर्शन कर सकेगा। इसके लिए जरूरी है कि वह अपने आंख,नांक,कान को खुला रखें और सारी सूचनाओं को अपने तक आने दे। साथ ही अपने अन्य लोगों और कर्मचारियों की राय पर भी गौर करें।

अपडेट रहें-

कृष्ण कहते हैं कि कर्म करते रहो,पर साथ में आगे बढ़ने के लिए अपने आपको अपडेट भी करते रहो। अपने ज्ञान को अपडेट किए बिना आप आगे नहीं बढ़ सकते। समय को पहचानें और उसके अनुसार ज्ञान हासिल करें,तभी आप तेजी से आगे बढ़ सकते हैं।

विशाल ह्वदय बनें-

प्रबंधनकर्ता को हमेशा धैर्य से काम लेना चाहिए। छोटी-छाटी चीजों पर उसे अपना आपा नहीं खोना चाहिए,और जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए। इसके लिए प्रबंधक को विशाल ह्वदय का होना पडेगा। वहीं आवश्यकता प़डने पर अनुशासन को बनाए रखने के दृष्टिकोण से किसी तरह की कोमलता भी नहीं दिखानी चाहिए।

क्षमाशील बनें -

प्रबंधन में रहते हुए प्रबंधक को उद्दण्ड तथा अक्षम सहायक को भी क्षमा करना चाहिए तथा बार-बार उसे आगाह करते रहना चाहिए परंतु जब वह सीमा पार करने लगे और दण्ड देने के अतिरिक्त कोई चारा न हो तो ऐसा दण्ड दिया जाना चाहिए जो दूसरों के लिए भी उदाहरण का काम करे।

अहंकार-

गीता में कहा गया है कि अहंकार के कारण नुकसान होता है। कई बार प्रबंधक लगातार सफलता प्राप्त करने के बाद अपनी ही पीठ ठोंकता रहता है। वह यह समझने लगता है कि अब सफलता उसके बाएं हाथ का खेल है।

इसके बाद जब उसे असफलता मिलती है तो क्रोध व अन्य विकारों का जन्म होता है। फिर व्यक्ति अपनी आकांक्षाएं पूरी न होने की स्थिति में तुलना करना आरंभ कर देता है। उसे जो कार्य दिया रहता है,उसमें मन नहीं लगता और वह भटक जाता है। इस कारण अहंकार से दूर रहना चाहिए,तब ही सभी तरह की सफलताएं आप पचा पाएंगे।

नैतिक मूल्य व प्रोत्साहन-

गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि युद्ध नैतिक मूल्यों के लिए भी लड़ा जाता है। कौरव व पांडव के बीच युद्ध के दौरान अर्जुन को कौरवों के रूप में अपने ही लोग नजर आ रहे थे। ऐसे में वह धनुष उठाने से मनाकर देते हैं।

तब श्रीकृष्ण यद्ध के मैदान में ही अर्जुन को अपने उपदेशों के माध्यम से नैतिकता और अनैतिकता का पाठ पठाते हैं,और युद्ध के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसी तरह आज के प्रबंधकों को भी असंभव लक्ष्य पूरा करने के लिए दिए जाते है। ऐसे में कृष्ण जैसे प्रोत्साहनकर्ता की भी जरूरत है।

श्रेष्ठ प्रबंधक-

अर्जुन ने कुरुक्षेत्र में युद्ध के लिए श्रेष्ठ मैनेजर के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को चुना था और अंत में विजयी भी हुआ। किसी भी कंपनी में अगर मैनेजर श्रेष्ठ हो,तब वह किसी भी प्रकार के कर्मचारियों से काम करवा सकता है।

इसके उलट अगर कंपनी के पास केवल श्रेष्ठ कर्मचारी हैं और उन्हें देखने वाला कोई नहीं है या नेतृत्वकर्ता को खुद ही सही दिशा का ज्ञान नहीं है तब जरूर मुश्किल आ सकती है।

ऐसे में सभी कर्मचारी अपनी बुद्धि के अनुसार काम तो करेंगे पर उन्हें सही मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं होगा। ऐसे में कंपनी किस ओर जाएगी,यह कह नहीं सकते।

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